Saturday, 10 July 2010

पुल निर्माण स्थल से तीन कर्मी अगवा

कोडरमा थानांतर्गत मेघातरी गांव के पास करहरिया नदी पर करीब 4 करोड़ की लागत से निर्माणाधीन पुल निर्माण स्थल से शुक्रवार की शाम 18-20 हथियारबंद अपराधियों ने ठेकेदार के तीन कर्मियों को अगवा कर लिया। अपराधियों ने साइट पर आते ही दहशत पैदा करने के लिए 10-12 राउंड फायरिंग की और मजदूरों व कर्मियों की लाठी डंडे से जमकर पिटाई शुरु कर दी। इससे कई मजदूरों को गंभीर चोटें आयी हैं। वहीं फायरिंग में कई लोग बाल-बाल बच गए। करीब 15-20 मिनट तक उत्पात मचाने के बाद अपराधी तीन कर्मी संजय तिवारी, कृष्णा तिवारी व दिलीप को मारपीट करते हुए साथ लेकर जंगल की ओर चल दिए। इधर, घटना की सूचना मिलने के बाद रात्रि में ही कोडरमा पुलिस ने छापामारी शुरू कर दी है।

Thursday, 8 July 2010

पेट के खातिर ढिबरा चुनते मासूम बच्चे


कोडरमा जिले के तिलैया बस्ती के निकट चरकी माइंस में जान हथेली पर रख कर मासूम बच्चे पेट के खातिर ढिबरा (माइका की रद्दी) चुनते हैं. यह एक दिन का काम नहीं है. बल्कि सूरज की किरण फूटते ही तिलैया बस्ती और आस-पास के ग्रामीण इलाकों के कई दर्जन बच्चे ढिबरा चुनने के लिए निकल पड़ते हैं. साथ ही कई बार तो इन्हें दस-दस फीट माइंस की खो में भी उतरना पड़ता है. दिन भर की कड़ी मशक्कत के बाद ये छोटी-छोटी टोकरियों में चार से पांच किलो ढिबरा चुन पाते हैं. जिसे बेचने पर मात्र इन्हें पांच से 10 रुपये तक मिलते हैं. हाथों में कलम खुरपी रहती है जिन मासूम हाथों में किताब, कलम और कॉपी होनी चाहिए, उन हाथों में खुरपी, हथौड़ी और टोकरी होती है. इन बच्चों को देखकर कहा जा सकता है कि घर-घर में शिक्षा का दीप जलाने का शिक्षा विभाग का दावा कोडरमा जिला में कितना कारगर सिद्ध हो रहा है. कई बार तो इन मासूम बच्चों के साथ दुर्घटनाएं भी हो जाती है तथा इन्हें जान भी गंवानी पड़ती है. इन बच्चों से जब पूछा गया तो कहते हैं कि उन्होंने कभी भी स्कूल का मुंह नहीं देखा है. साथ ही अभिभावक भी सब कुछ जानते हुए भी निगाहें फेर कर रखते हैं. उन्हें भी पता है कि ये मासूम बच्चे ढिबरा बेच कर जो कुछ लाते हैं, उनसे किसी प्रकार उनके परिवार का भरण-पोषण होता है.

Saturday, 3 July 2010

जेब के साथ सेहत पर भी असर दिखाने लगी महंगाई

मंहगाई कल तक जेब ढीली कर रहा था। आज सेहत पर भी असर दिखा रहा है। इस तल्ख सच्चाई से हर किसी का वास्ता पड़ रहा है। पिछले 25 जून को पेट्रोलियम पदार्थो की कीमतों में वृद्धि हुई जिसके बाद हर घर की रसोई में गहरी उदासी छा गयी। आटा, चावल, दाल, सब्जी, पापड़, तेल, मशाला,दूध,घी आदि सभी दैनिक उपयोग की सभी सामानों के महंगे होने की आशंका जो बन गयी थी। वह आशंका सच साबित हुई। सभी जरूरी सामानों की कीमतें आज 5 से 10 फीसदी तक बढ़ गयी। आय बढ़ी नहीं और जरूरी सामानों की कीमतें बढ़ गयी तो सेहत पर भी इसका कुप्रभाव पड़ना ही है। कल जक जिस रसोई में औसतन प्रतिदिन दो किलोग्राम सब्जी की खपत थी। बढ़ी हुई कीमतों के साथ आज उसमें कटौती की जाने लगी है। यही हाल अन्य सामग्री का भी है। घरेलू महिला मधु कहती हैं कि इतनी तेजी से मंहगाई बढेगी ऐसा कभी सोचा ही नहीं था। वहीं मीनाक्षी श्रीवास्तव कहती हैं रोज-रोज सामानों की कीमत बढ़ेगी तो भला घर का बजट गड़बड़ायेगा ही। आज घर का पूरा मासिक बजट ही गड़बड़ाता दिख रहा है। आय बढ़ने के साधन नहीं है। शिक्षिका मनोरमा कुमारी का कहना है कि अब उपयोग की जाने वाली सामानों में कटौती करनी पड़ रही है। आसमान छूती मंहगाई से निपटने का यही एक उपाय सूझ रहा है। इन महिलाओं की बातों से साफ है कि महगाई अब जेब ढीली करने तक ही नहीं रह गयी बल्कि लोगों के सेहत को भी प्रभावित करने की स्थिति में है। पेट्रोलियम पदार्थो व रसोई गैस की कीमतों में वृद्धि का असर शादी-विवाह पर भी पड़ने लगा है। वाहन संचालकों ने किराया में वृद्धि कर दी है। माल ढुलाई बढ़ने से अन्य जरूरी सामान की कीमतें बढ़ गयी है। जिससे वर हो या वधू पक्ष हर किसी का वजट असंतुलित हो गया है। वैसे भी वर्षात के मौसम में सब्जी सहित अन्य सामग्री की कीमतें कम उपज के कारण बढ़ जाया करती है। रही सही कसर पेट्रोलियम पदार्थो की कीमतों में वृद्धि से पूरी हो गयी है।

Friday, 2 July 2010

अधर में लटका हुआ है सौ शैया के सदर अस्पताल का निर्माण


सौ शैया वाला सदर अस्पताल लगभग पॉच सालों से अधर में लटका हुआ है। फंड के अभाव में निर्माण कार्य ने अब तक गति नहीं पकड़ी है। जिले के लोग आज भी अनुमण्डलीय अस्पताल पर निर्भर है। 16 जुलाई 2005 को झाारखंड के तत्कालीन महामहिम सैयद सिब्ते रजी ने सौ शैया वाले सदर अस्पताल की अधारशिला रखी थी तब लगभग पॉच करोड़ रूपये अस्पताल निर्माण पर खर्च होने थे और इसे नियत समय में पूरा किया जाना था। निर्माण पुरा करने की अवधि समाप्त हो चुकी है। 10 अप्रैल, 1994 को कोडरमा जिला का सृजन हुआ था। तभी से यह आवश्यकता महसूस की जा रही थी। फिलवक्त स्थिति यह है कि अनुमण्डलीय अस्पताल को हीं उत्क्रमित कर सदर अस्पताल का दर्जा तो दे दिया गया लेकिन सदर अस्पताल के अनुरूप पदों का सृजन नहीं किया गया। वहीं पुराने पद अभी भी बरकरार है। चिकित्सकों, परामेडिकल कर्मियों का घोर अभाव बना हुआ है। सिविल सर्जन डा0 पी0मोहन से जब इस मुत्तलिक बात की गई तो उन्होने कहा कि विभागीय काम हो रहा है और उसमें स्वास्थ्य प्रशासन का कोई हस्तक्षेप नहीं है। निर्माण कार्य एच0सी0एल0 नामक कम्पनी से करवाई जा रही है कम्पनी के लोग भी परेशान है। कई बार फंड के अभाव में उन्हें निर्माण कार्य रोकना पड़ा है। दुसरी ओर स्वास्थ्य चिकित्सा, शिक्षा एवं परिवार कल्याण मद से सी0 व0 डी0 टाईप क्वार्टर, ए0एन0एम0 ट्रेनिंग सेंटर और सिविल सर्जन कार्यालय का भी निर्माण हो रहा है। इन सबों का शिलान्यास विधायक अन्नपूर्णा देवी ने वर्ष 2008-09 में किया था जो आज पुरी होने की स्थिति में है।

Thursday, 1 July 2010

बरसात आते ही बढ़ा रेंगती मौत का खतरा

बरसात का मौसम आते ही रेंगती मौत का खतरा बढ़ गया है। आये दिन सर्पदंश से मौत की खबरें सूनी जा रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में सांप काटने के बाद लोग ओझा-गुणी के चक्कर में पड़कर समय गंवा देते हैं। इसके बजाय यदि वे समय पर अस्पताल आए तो मौत से बचाया जा सकता है। बरसात के मौसम में कोबरा, करैत व अन्य जहरीले सांप भी अपने ठिकाने बदलने के लिए भटकते हैं। ऐसे में कोई उसके राह में रूकावट बने तो उसकी खैर नहीं। सांप काटे तो सीधे मरीज को अस्पताल जाना चाहिए, तभी समुचित उपचार संभव हो सकता है। कोडरमा सदर अस्पताल में जहरीले सांपों की दवा भी उपलब्ध है। सिविल सर्जन पी मोहन का कहना है कि यदि हाथ अथवा पैर में सांप काटे तो तत्काल उस अंग को थोड़ी दूर पर धीरे से बांधना चाहिए, ताकि धीरे-धीरे खून का बहाव होता रहे। इसके बाद मरीज को तुरंत अस्पताल लाना चाहिए। सदर अस्पताल में सांप काटने का एंटी स्नेक सीरम दो तरह का उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि यदि सांप की पहचान हो जाए तो बेहतर है अन्यथा चिकित्सकों को काफी सावधानी पूर्वक मरीज में होने वाले लक्षण को भांप कर ही दवा देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि लक्षण पर गौर करके उपचार हो तो रोगी को आसानी से बचाया जा सकता है। इसमें थोड़ा समय जरूर लगता है। उन्होंने कहा कि सांप का इंजेक्शन भी जहरीला ही होता है, ऐसे में जांच कर ही दवा देना चाहिए। प्राइवेट क्लिनिकों में भी इसका इलाज हो सकता है। जहरीला सांप काटने के बाद रोगी के आंख की पपनी, धड़कन, शरीर का तापमान आदि पर गौर करना महत्वपूर्ण होता है। जिसके आधार पर इलाज संभव हो पाता है।

Wednesday, 24 March 2010

अंधविश्वास ने ली बालक अमन की जान


6 वर्षीय बालक की हत्या कर बोरे में शव फेंका, नरबलि की सम्भावना
अंधविश्वास ने एक बालक की जान ले ली। कोडरमा जिले के डोमचांच ओपी अंतर्गत पूर्णाडीह से अगवा अमन की हत्या कर दी गयी। रामनवमी के दिन 24 मार्च को पूर्णाडीह गांव से ही 6 वर्षीय अमन का शव बोरे में बन्द करके फेंका हुआ बरामद किया गया। उक्त बालक का सिर मुंडा हुआ था और उसकी हत्या गला रेतकर की गयी थी, ऐसे में घटना के पीछे नरबलि की आषंका सही हो सकती है। पूर्णाडीह निवासी और पत्थर व्यवसायी ईष्वरी साव उर्फ मुंषी का पुत्र अमन 20 मार्च से अचानक अपने घर से ही लापता हो गया था। उसकी काफी खोजबीन की गयी पर कुछ पता नहीं चला और इस बाबत मरकच्चो थाना में एक सनहा भी दर्ज कराया गया था। घटना के एक दिन बाद परिजनों को एक चिट्ठी भी मिली थी जिसमें 90 हजार रूपये की मांग की गयी थी वहीं बच्चे के सही सलामत होने की बात कही गयी थी। यह तो स्पष्ट हो गया था कि बच्चे का अपहरण किया गया है पर पुलिस इस मामले में कोई सुराग पाने में पूरी तरह विफल रही थी। 24 मार्च को दिन में मुषी साव के घर से लगभग 100 मीटर दूर बोरे में बन्द कर बालक के शव को फेंक दिया गया। इससे जहां पूरे परिवार में कोहराम मच गया वहीं शव को देखने से प्रतीत हुआ कि उसकी हत्या के पीछे नरबलि कारण हो सकता है। खोजी कुत्ता को भी मंगाया गया और वह शव बरामदगी स्थल से जाकर मुंषी साव के पडोस के एक घर के पास रूक गया जो ओझा गुणी और भक्तिन का काम करने वाले का घर है। यह भी बताया जाता है कि जिस महिला पर या परिवार पर नरबलि के मकसद से हत्या की आषंका जतायी जा रही है उस महिला ने शव बरामदगी के कुछ समय पहले मुंषी साव की मां से मिलकर रोते हुए बालक के जल्दी ही मिल जाने की बात कही थी। पुलिस ने शक के आधार पर सीताराम पंडित, उसकी मां और अन्य परिजनों को हिरासत में ले लिया। हांलाकि इस मामले में थाना में हत्या का मामला दर्ज किया गया है पर यह बात भी सामने आयी है कि इस मामले में पुलिस की भूमिका सही नहीं रही। यदि बच्चे के लापता होने के बाद पुलिस सक्रिय रहती और मामले को गम्भीरता से लेती तो परिणाम कुछ और हो सकता था, यहां तक की लापता होने और अपहरण की आषंका के बाद भी पडोस के घरों में भी पुलिस ने छानबीन नहीं की थी।

Saturday, 20 February 2010

कोडरमा के कई गांवों में दर्जनों लोग पानी से हुए विकलांग


झारखंड बिहार की सीमा पर बसे कोडरमा जिले के कुछ गांव ऐसे हैं जहां पानी के इस्तेमाल से बच्चे और बडे विकलांग हो रहे हैं। ये बदनसीब ऐसे कि पानी का घूंट लेते वक्त उनके हाथ-पैर कांपते हैं। इन गांवों में बडे भी खुद कब की लाठी थामे हैं, अब बच्चों को बैसाखियों के सहारे जिंदगी ढोते देख रहे हैं। कोडरमा घाटी में बसे गाव मेघातरी, उससे सटे विष्नीटिकर और करहरिया को विकास का मुखौटा तो मिल गया, हाल ही में बिजली भी पहुंची लेकिन सालों पुराने फ्लोराइड की अधिकता का अभिशाप आज यहां जनजीवन पर कुंडली मारे बैठा है। आलम यह है कि गाव के दर्जनों बच्चे और बुजुर्ग विकलाग हो चुके हैं। कुछ पढ़े-लिखे ग्रामीणों ने यह दर्द प्रशासन तक पहुंचाया पर कोई परिणाम नहीं निकला। बैसाखी पर लटके युवाओं और बच्चों को देखकर इनका दिल रोता है। गाव छोड़कर शहर में बसना चाहते हैं, लेकिन आर्थिक मजबूरियों की बेड़िया कहीं ज्यादा मजबूत हैं। जिला मुख्यालय कोडरमा से सिर्फ 18 किलोमीटर दूर मेघातरी पंचायत की आबादी करीब ढाई हजार है। पहले जब यहां काफा मात्रा में माइका निकलता था तब क्षयरोग से युवावस्था में ही लोगों की मौत हो जाने से बडी संख्या में महिलाओं के विधवा हो गयी थीं और इसे विधवाओं की बस्ती कहा जाने लगा। अब यहां जल में फ्लोराइड की मात्रा ज्यादा होने के कारण एक के बाद एक ग्रामीण विकलाग होते जा रहे हैं और तीन साल के बच्चों तक के शरीर विकृत हो चुके हैं। पानी की सुविधा के लिए गाव में कई चापानल भी लगाये गये पर स्थिति नहीं सुधरी और नये नये मामले सामने आते रहे हैं। गाव में रहने वाले 28 साल के कुन्दन कहते हैं दो साल पहले अचानक स्थिति बिगडी जिसके बाद कई जगहों पर इलाज करवाया पर ठीक नहीं हो सका। मेघातरी में सत्येन्द्र सागर सिंह का 11 वर्षीय पुत्र रीतिक, जगदीष प्रसाद का 4 वर्षीय पुत्र राजू, सरयू साव का 6 वर्षीय पुत्र दिवाकर पैरों से विकलांग हो चुके हैं। इसी प्रकार करहरिया में जितेन्द्र (13 वर्ष, पिता लक्ष्मण सिंह), संगीता कुमारी (6 वर्ष, पिता विजय सिंह), झलवा (13 वर्ष, पिता स्व. सरयू सिंह), बसंती (12 वर्ष, पिता जेठू सिंह), बिरेन्द्र सिंह (13 वर्ष, पिता कैलू सिंह) भी विकलांगता के अभिषाप से ग्रस्त हैं। बिरेन्द्र की पत्नी सूनीता और लक्ष्मण सिंह की पत्नी लीलवा देवी भी विकलांग हो चुकी है। 13 साल के जितेन्द्र का पैर भी मुड़ चुका है और आज वह लाठी के सहारे चलता है। सामाजिक कार्यकर्ता और मेघातरी निवासी सत्येन्द्र सिंह सागर ने पानी के कारण बच्चों के विकलांग होने की जानकारी सरकारी स्तर पर विभाग को और उच्चाधिकारियों को इसकी जानकारी दी पर अब तक कोई कार्यवाई नहीं हुई। ऐसे में यहां के बच्चे पानी के कारण विकलांग होने और लाठी का सहारा लेने को अभिषप्त हैं। इस बीमारी के संबंध में कोडरमा के एसीएमओ डा. एमए अषरफी से बात करने पर उन्होंने कहा कि यह विटामिन डी या हार्मोन की कमी के कारण भी हो सकता है। पानी में फ्लोराइड की ज्यादा मात्रा भी कारण हो सकता है। उन्होंने बताया कि इसकी जांच के लिये एक टीम गठित की जायेगी जो जल्द ही जांच कर रिपोर्ट देगी और तब इनका इलाज करवाया जा सकेगा।